शहीद दिवस: 23 मार्च 1931 भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी शहादत - Yugandhar Times

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Monday, March 24, 2025

शहीद दिवस: 23 मार्च 1931 भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी शहादत

 

🔵भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को दी नयी दिशा 

🔴 माँ भारती के सपूतों को याद करने के लिए हर वर्ष 23 मार्च को मनाते है शहीद दिवस 

🔵 बृज बिहारी त्रिपाठी 

कुशीनगर। शहीद दिवस भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान की याद में हर वर्ष मनाया जाता है। 23 मार्च, 1931 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तीन महान शहीदों को फांसी हुई थी, इन तीन वीर सपूतों ने अपने प्राण की आहुति देकर स्वतंत्रता के संग्राम को जहां नया मोड दिया, वही आजादी की दिशा को और मजबूत किया। आज भी इस दिन को हम भारतीय शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। ताकि हम उनके बलिदान को याद कर सके और संघर्ष को सम्मान दे सके। 

🔴 शहीद दिवस का आइने इतिहास 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारी वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को दिशा और ऊर्जा प्रदान किया। यह घटना सीधे तौर पर लाल लाजपत राय के बलिदान से जुड़ी हुई थी। 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसका नेतृत्व लाल लाजपत राय ने किया। ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेम्स ए स्कॉट के आदेश पर इस प्रदर्शन में लाठी चार्ज किया गया, जिससे लाल लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए। कहा जाता है कि उनका निधन 17 नवंबर 1928 को दिल का दौड़ा पड़ने से हुआ। उनकी मौत का कारण पुलिस की लाठियां थी। लाल लाजपत राय के मृत्यु को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने आरोपी जेम्स ए स्कॉट से बदला लेने का फैसला किए। उन्होंने स्कॉट को मारने का प्रयास किया, लेकिन गलती से सांडर्स नामक पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी। इसके बाद भगत सिंह सहित उनके साथियों को हत्या का दोषी ठहराया गया। राजगुरु को पुणे से और सुखदेव को लाहौर से गिरफ्तार किया गया। भगत सिंह और उनके साथियों पर षडयंत्र का मुकदमा भी जेल में रहते हुए चलाया गया। अदालत में तीनों क्रांतिकारियों का अपराध भी सिद्ध किया, और 7 अक्टूबर 1930 को फैसला सुनाया गया।  फैसले में भगत सिंह, सुकदेव और राजगुरु को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने फांसी के फैसले को बदलने के लिए दया याचिका दायर की, 14 फरवरी 1932 को न्याय परिषद ने इस याचिका को खारिज कर दिया। लगभग दो वर्ष तक जेल में रहते हुए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचारों को व्यक्त किया, उनके द्वारा लिखे गए लेख आज भी उनके विचारों के शक्त दर्पण है। 

🔴क्रान्तिकारियों ने '' मेरा रंग दे बसंती चोला '' गाते हुए चढ गये फासी पर

23 मार्च 1931 की शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई। कहा जाता है कि फांसी से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, उनसे आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह किताब को पूरा पढ़ना चाहते थे। जब जेल अधिकारी ने उन्हें सूचित किया कि फांसी का समय आ गया है, तो भगत सिंह ने कहा ठहरिए, पहले एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल हो ले, और फिर एक मिनट बाद बोले: "ठीक है अब चलो।" तीनों क्रांतिकारियों ने "मेरा रंग दे बसंती चोला" गाते हुए फांसी की ओर बढ़े। 23 मार्च की रात अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के तीन वीर सपूतों को फांसी पर लटका दिया। इन महान क्रांतिकारियों के साहस और संघर्ष का प्रतीक बन गया। तीनों की शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम की गति को तेज ही नहीं बल्कि भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। इन वीर सपूतों को याद करने के लिए हम हर वर्ष 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाते है। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमारी आजादी कई बलिदानों और संघर्षों के बाद मिली है। हर स्वतंत्रता संग्राम के नायक होते है, जो अपनी जान को दाव पर लगाकर देश की स्वतंत्रता और रक्षा के लिए लड़ते है।

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